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नमस्कार, मेरे चैनल में आपका स्वागत है और आज इस वीडियो में हम मिर्गी से जुड़े लक्षण और उसे ठीक करने की होम्योपैथिक दवा के बारे में जानेंगे, वीडियो को पूरा अवश्य देखें ताकि आप पूरी तरह समझ पाएं, तो आइये समझते हैं। मिर्गी रोग के वास्तविक कारण का निर्णय अभी तक नहीं हो सका है। फिर भी माता-पिता के वंश में यह रोग रहने, उपदंश, अत्यधिक हस्त-मैथुन, संक्रामक रोग, सिर पर चोट लगना, भय, अर्बुद, अधिक शराब पीना, कृमि, बहुत अधिक बोलना, जड़ हो जाना, शारीरिक अथवा मानसिक अवसन्नता, अत्यधिक शक्तिहीनता एवं अपच आदि कारणों से यह रोग हो सकता है। किशोरावस्था में किसी अन्य व्यक्ति के मिर्गी रोग की खींचन को देखने अथवा दूसरी बार दाँत निकलने के समय इस बीमारी का हो जाना मूल कारण माना जाता है। इस रोग में रोगी अचानक ही बेहोश होकर जमीन पर गिर जाता है। किसी-किसी को रोग का आक्रमण होने से पूर्व सिर में चक्कर आने लगते हैं, सिर में दर्द होने लगता है तथा ऐसा अनुभव होता है, जैसे सिर के भीतर कोई कीड़ा रेंग रहा हो। कान में भौं-भौं शब्द होना, सम्पूर्ण शरीर में कंपकंपी, शरीर में दर्द, धुंधला दिखाई देना आदि लक्षण प्रकट होते हैं। बेहोशी की अवस्था में अंगूठे मुड़ जाते हैं, हाथों की मुट्ठियाँ बन्द हो जाती है, आँखों में चमक नहीं रहतीं तथा आँखों के ढेले स्थिर हो जाते हैं और शरीर अकड़ने लगता है। किसी-किसी के मुँह से झाग निकलने लगते हैं, दाँती भिंच जाती है तथा रोगी पूरी तरह से बेहोश हो जाता है। बेहोशी आते समय रोगी प्राय: अचानक ही जोर से रोता हुआ गिर जाता है। हाथों की अँगुलियाँ सिकुड़ने लगती हैं। आँखों की पुतलियाँ नीचे-ऊपर उठने लगती हैं तथा कलेजे की धड़कन बढ़ जाती है। चेहरा पहले पीला, बाद में लाल रंग का हो जाता है। बेहोशी की हालत में रोगी हाथ-पाँव पटकता हैं तथा उसके शरीर से ठण्डा एवं लसदार पसीना भी निकलता है। बीस-पच्चीस मिनट बाद इन उपसगों के कम हो जाने पर रोगी गहरी नींद में सो जाता है तथा जब होश में आता है तब स्वयं को अत्यधिक अशक्त अनुभव करता है। बेहोशी के समय की कोई बात उसे याद नहीं रहती। जब यह रोग पुराना पड़ जाता है, तब धीरे-धीरे मानसिक-वृत्तियाँ क्षीण हो जाती हैं। उस समय रोगी पागलपन अथवा पक्षाघात का शिकार भी हो सकता है। होमियोपैथी दवा की बात करें तो :- Dr. Reckeweg R33 जोकि Convulsions Drops के नाम से आती है, आप इसका इस्तेमाल कर सकते हैं। इसमें कई होमियोपैथी दवा मिली हुई है जैसे :- Bufo, Cuprum, Pulsatilla, Silicea और Zincum. ये सभी दवाएं मिलकर मिर्गी के रोग का बहुत अच्छी दवा के रूप में उपलब्ध है। इसकी 10 बून्द आधे कप पानी में डाल कर दिन में 3 बार लें। शुरू में करीब 2 महीने दिन में 3 बार लें फिर रोजाना एक बार कर दें, मिगी जिन्हे आती रहती है जैसे हर हफ्ते या महीने पर इससे ऐसी समस्या नहीं आएगी। अब मिर्गी रोग में लक्षणानुसार निम्नलिखित होम्योपैथिक औषधियाँ लाभ करती हैं वो बता रहा हु जो आपको Reckeweg R33 के साथ लक्षण मिलने पर इस्तेमाल करनी है। Ignatia 200 – यदि किसी दवा के लक्षण स्पष्ट न हों तो मिर्गी रोग में इसी दवा से उपचार आरम्भ करना चाहिए। इससे लाभ न होने पर लक्षणों का मिलान करके अन्य औषधियों का व्यवहार करना चाहिए। भय, आतंक तथा मानसिक-गड़बड़ी के कारण मिर्गी के दौरे पड़ने की यह श्रेष्ठ औषध है। इसकी 2 बून्द रोजाना जीभ पर टपकाया करें। Cuprum Metallicum 30 – यह भी मिर्गी रोग की उत्तम औषध है। मिर्गी रोग में हवा की लहर का घुटनों से उठ कर पेट के निम्न भाग तक चढ़ जाना, माँसपेशियों में थिरकन, पिण्डलियों तथा तलवों में ऐंठन, अंगूठे का अँगुलियों में भिंच जाना, कभी-कभी अंगुलियों तथा अंगूठों से ऐंठन का आरम्भ होना तथा शुक्लपक्ष में मिर्गी रोग के दौरे आना, बता दू कि अमावस्या और पूर्णिमा के बीच के अंतराल को शुक्ल पक्ष कहा जाता है। किसी भी अन्य औषध की अपेक्षा यह औषध मिर्गी के दौरे में कमी लाती है तथा पुराने अथवा कठिन मिर्गी रोग की बहुत ही अच्छी दवा है। अत्यधिक खींचन तथा चेहरा नीला पड़ जाने के लक्षणों में लाभकर है। इन लक्षणों में यह औषध लाभ करती हैं। इस दवा की 2 बून्द रोजाना सुबह और शाम जीभ पर टपकाएं। Bufo-Rana 30 – हस्तमैथुन अथवा अधिक कामुकता के कारण उत्पन्न मिर्गी रोग में यह औषध हितकर है। रोगी दौरा आरम्भ होने से पहले खूब जोर से चिल्ला उठता है वह क्या कहता है ठीक से समझ में नही आता। जननेन्द्रिय की उत्तेजना पीड़ा का कारण है अथवा जननेन्द्रिय सुरसुरी (Aura) आरम्भ होकर मिर्गी का दौरा होता है तो इससे फायदा होगा। दौरे के बाद सो जाना भी इसका एक लक्षण है। ऐसे में आप इस दवा का इस्तेमाल करें रोजाना 2 बून्द एक समय या दो समय कर सकते हैं। Belladonna 30 – यह औषध नवीन मिर्गी रोग में लाभ करती है। विशेष कर बच्चों की बीमारी में हितकर है। इसकी ऐंठन हाथों से आरम्भ होकर चेहरा तथा आँख की ओर जाती है। आँखों का चमकीला लाल होना, श्वास-कष्ट, चेहरे का लाल होना, रोशनी सहन न होना, आँखों का फैल जाना तथा रोगी का चौंक पड़ना आदि लक्षणों में इसका प्रयोग करें। Silicea 30 – रोग-लहर का नाभि-प्रदेश से आरम्भ होना, पूर्णिमा तिथि को रोग का बढ्ना, सम्पूर्ण सिर पर तथा गर्दन तक दुर्गन्धित पसीना आना, रोगी का निर्बल तथा चिड़चिड़े स्वभाव का होना तथा किसी भी मनोभाव के कारण रोगी को ऐंठन अथवा मिर्गी का दौरा पड़ जाना-इन लक्षणों में यह औषध लाभ करती है। Hydrocyanic Acid 30 – डॉ० ह्यूजेज के मतानुसार यह इस रोग की स्पेसिफिक औषध है। मुँह का ऐंठन, मुँह से झाग आना जैसे लक्षण में बहुत अच्छा काम करती है। कुछ मुख्य बातें यदि रोगी की दाँती लग गई हो तो उसे छुड़ाकर दाँतों के बीच में कोई कार्क अथवा कपड़े की पोटली लगा देनी चाहिए। यदि रोगी की जीभ बाहर निकल आई हो तो उसे भीतर डाल देना चाहिए। बेहोश रोगी की नाक के पास एमिल नाइट्रेट रखना लाभकर होता है। यदि रोग का आक्रमण तीव्र हो तो क्लोरोफार्म सुंघाने की आवश्यकता भी पड़ सकती है। रोगी को जोर की हवा करनी चाहिए तथा उसके मुँह पर पानी के छोटे मारने चाहिए। यदि बेहोशी गहरी हो तो रोगी को जबर्दस्ती जगाने का प्रयत्न न करके, उसे सोने देना चाहिए।

One thought on “मिर्गी का होम्योपैथिक इलाज – Homeopathic Medicine For Epilepsy

  1. Sir hame thyorid ki problem hai THS 8.1 hai gas bahut banta hai joint me dard rahata hai please medicine bataye sir please

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